शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008

कथा पुराण-- भाग-1 ...मेनका का डांस स्कूल

देवलोक में सब जानते थे कि मेनका का अपना डांस स्कूल है। उसके डांस स्कूल की देवलोक में वही रेपुटेशन थी, जो रेपुटेशन बॉलीवुड में सरोज खान की डांस एकेडमी की है। लिहाजा उसके डांस स्कूल में देवलोक के धनवान और रसूखदार लोगों की बच्चियां ही डांस सीखने आती थीं। देवलोक का ऐसा कोई डांस कंपीटिशन नहीं था, जिसमें मैडम मेनका की चेलियों ने धाक ना जमाई हो। जाहिर है, मैडम मेनका दोनों हाथों से दौलत बटोर रही थीं। ये और बात है कि मैडम को ये स्कूल अपने बुरे दिनों में गुजर-बसर के लिए शुरू करना पड़ा था। दरअसल विश्वामित्र के साथ अफेयर के बाद राजनर्तकी मेनका देवलोक में अपना दर्जा खो बैठी थीं। पहले उसे राज नर्तकी के पद से हाथ धोना पड़ा और फिर देवलोक के नियमों के मुताबिक उससे सरकारी बंगला और गाड़ी भी छीन ली गई। देवराज बेचारे कलेजे पर पत्थर रखे ये सब देखते रहे। लेकिन कुछ कर नहीं पाए। एक बार तो सोचा, कि संविधान में संशोधन करवा कर मेनका के लिए कोई खास धारा जुड़वां दें कि उससे कोई सरकारी सुविधा वापस ना ली जाए। लेकिन मजबूर थे। अपनी पार्टी के अल्पमत में होने का उन्हें पहली बार अफसोस हो रहा था। डर था कि कहीं ये मुद्दा विदवत परिषद में न उठ जाए। किसी शरारती विरोधी ने अविश्वास प्रस्ताव रख दिया तो पास होना पक्का है। क्योंकि मेनका के साथ अपने अंतरंग रिश्तों की वजह से देवराज पहले ही काफी बदनाम हो चुके थे। देवराज को ये भी अंदेशा था कि उनके जिन विरोधियों को मेनका ने कभी घास नहीं डाली, उन्हें तो बस एक मौके का ही इंतजार है। देवराज जानते थे कि वह लोग देवलोक में बिजली-पानी और सड़क के मुद्दों पर भले ही खामोश रहते हों, लेकिन मेनका के मुद्दे पर उनकी सरकार पक्का गिरा देंगे।
यही सब सोच-सोच कर देवराज खामोश थे। उधर. मेनका ने न जाने कितनी बार कातर निगाहों से देवराज की ओर देखा, लेकिन कोई पॉजिटिव रेस्पांस नहीं मिला। रात-बेरात उन्हें फोन तक किए, लेकिन देवराज ने एक भी कॉल रिसीव नहीं की। हर बार उसे एक ही आवाज सुनाई देती--डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है, कृपा थोड़ी देर बाद डायल करें....हद तो तब हो गई जब मेनका के फोन करने पर देवराज का नंबर स्विच ऑफ आने लगा। मेनका को वो वक्त याद आने लगा जब मेनका की एक मिस्ड कॉल पर देवराज उसे फौरन फोन करते थे और फिर भोर होने तक दोनों के बीच मीठी-मीठी बातें होती थीं। देवराज मेनका के सामने अपने दिल के तमाम राज खोल कर रख देते थे और मेनका... मेनका तो देवराज को ऐसी-ऐसी बातें बताती थी कि उनकी होश फाख्ता हो जाते थे। मेनका उनके दरबारियों का कच्चा-चिट्ठा खोल कर रख देती थी। यानी मेनका देवराज की प्रेयसी कम मुखबिर ज्यादा थी। भाव-विभोर देवराज मैडम मेनका की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते थे, लेकिन कुछ ही दिन में सब बदल गया।
बार-बार गुहार का भी जब कोई असर नहीं हुआ, तो मैडम मेनका ने देवराज को जीभर के गालियां दीं। यानी देवराज की सरकार तो गिरने से बच गई, लेकिन वो खुद अपनी हॉट फेवरेट मेनका की नजरों से गिर गए। कुछ दिन बाद मेनका को समझना पड़ा कि ये सारा दोष उम्र का है। उम्र ढलने लगी है, इसीलिए उसके कजरे में अब पहले जैसी धार नहीं रही। वर्ना एक जमाना था जब उसकी एक नजर से पूरे देवलोक में मार-काट मच जाती थी। सचमुच... सब दिन होत ना एक समान। ऐसे में उसके सामने मसीहा बनकर आए-सूर्यदेव। वक्त की मारी मेनका को सूर्यदेव ने खुद ही मदद ऑफर की थी। शुरूआत में मेनका को सूर्यदेव की मदद लेने में थोड़ी झिझक हुई, क्योंकि मेनका की रिपोर्ट पर ना जाने कितनी बार देवराज ने सूर्यदेव की वॉट लगाई थी। मेनका अच्छी तरह जानती थी कि उसकी मुखबिरी ने ना जाने कितनी बार सूर्यदेव की चाल उलट दी थी। लेकिन उसके लिए अच्छी खबर ये थी कि सूर्यदेव उसकी साजिशों से बेखबर थे। दरअसल वो तो मेनका की अदाओं के कायल थे, इसलिए उसके करीब आने का मौका चाहते थे। सूर्यदेव जानते थे तो सिर्फ इतना कि मेनका के दिल में उतरने का इससे बेहतरीन मौका उन्हें फिर कभी नहीं मिलेगा। मजबूरी ने मेनका को भी सूर्यदेव के करीब ला दिया। दोनों की नजदीकियों ने जल्द ही असर दिखाया। सूर्यदेव ने अपने सियासी रसूख की धौंस दिखाकर देवराज के सामने शर्त रख दी कि सरकारी सेवाओं से महरूम की गईं मेनका का राजनर्तकी वाला दर्जा बहाल हो। उन्हें सभी सुविधाएं बा-इज्जत लौटाई जाएं।
ये तमाम ऐसी बातें थीं, जो मेनका के लिए देवराज के दिल में थीं। लेकिन बदले हुए हालात में उनके दिल के जज्बात भी बदल गए। आखिर इतने बरसों से राज कर रहे थे, कोई झक नहीं मार रहे थे। वो इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि अगर इस वक्त मेनका का पुराना दर्जा बहाल हुआ तो सारा क्रेडिट उनके निकटम प्रतिद्वंद्वी सूर्यदेव को मिलेगा। मेनका की नजरों से तो गिर ही चुके थे, अब सूर्यदेव के सामने किरकिरी कैसे करवा लेते। सो उन्हें फौरन संविधान सभा की याद आई। संविधान सभा की दुहाई देकर देवराज ने सूर्यदेव को समझाया कि मित्र मेनका से मुझे भी हमदर्दी है, लेकिन विश्वामित्र से मोहब्बत करके मेनका ने देवलोक के कायदे कानून तोड़े हैं। ऐसे में यदि हमने उसका दर्जा बहाल किया तो आपकी, हमारी और सरकार की जग हंसाई होगी। सूर्यदेव हर काम को जरा छुपकर करने में यकीन रखते थे। इसीलिए तमाम तरह शौक रखने के बावजूद उनकी सार्वजनिक छवि साफ सुथरी थी। बात जब इमेज की आई तो उन्हें मेनका की खातिर देवराज से टकराने में समझदारी नजर नहीं आई। लेकिन मेनका को जबान दे चुके थे। सो अपनी शर्त को जरा का लाइट करते हुए बीच-बचाव का रास्ता अपनाने की बात कही। देवराज तैयार हो गए। आखिरकार वो भी मेनका की नजरों में अपनी खोई हुई जगह फिर से पाना चाहते थे। लंबी मंत्रणा के बाद देवराज और सूर्यदेव ने तय किया कि फिलहाल मेनका को राजप्रासाद से दूर कहीं जमीन देकर एक आश्रम खुलवा देते हैं। जनता की यादाश्त कमजोर होती है। कुछ दिन बाद जब मामला शांत हो जाएगा, तो उसके नृत्य कौशल को पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया जाएगा। पाठ्य पुस्तकों के जरिए ये पढ़ाया जाएगा कि मेनका विश्वामित्र के पास अपनी मर्जी से नहीं गई थी, बल्कि राजाज्ञा से उसे ऐसा करना पड़ा। सत्ता के शीर्ष पर बैठे देवराज और सूर्य़देव ने जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ। कुछ दिनों में मेनका के पक्ष में हमदर्दी का माहौल बन गया। जिस आश्रम को मेनका अपने बुढ़ापे का ठिकाना मान रही थी, वो आश्रम से डांस स्कूल बन गया।
(जारी... अगले अंक में--- मेनका का बदला)

1 टिप्पणी:

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

गजब का चित्र खींचा है। सब समझ में आ रहा है। सारे पात्र आंखों के सामने घूम रहे हैं। अगली कड़ी का बेसब्री से इंतजार रहेगा।