गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008

कथा पुराण-- भाग-1 ...नाच बिना सब सून

पूरे देवलोक में अंधेरा छाया हुआ था। लोग हैरान परेशान थे कि सभी हाइड्रोलिक पावर प्लांट सही काम कर रहे थे, फिर भी अंधेरा क्यों है। बेचारे इस बात से अनभिज्ञ थे कि देवलोक में अंधेरे का मूल कारण था- देवराज इंद्र का खराब मूड। कई दिनों से देवराज के चेहरे पर 12 बजे थे। हर वक्त उन्हें बस एक ही चिंता खाए जा रही थी कि रंभा, मेनका और उर्वशी के बूढ़ी होने के बाद उनके दरबार में डांस आइटम कौन पेश करेगा। इसी फिक्र में उन्होंने पूरे देवलोक में ब्लैक आउट का ऐलान कर रखा था। अब देवलोक में उजाला तभी संभव था जब देवराज को कोई उम्मीद की किरण दिखाए और उनके लिए राजनर्तकी का प्रबंध करे। देवराज के इस ऐलान से सबसे ज्यादा परेशान बिजली मंत्री सूर्यदेव थे। हों भी क्यों नहीं, पूरी मंत्री परिषद तानों से उनका कलेजा छलनी किए दे रही थी। सबकी जुबां पर एक बात थी- क्या सर, आपके राज में भी सूरज तले अंधेरा रहेगा तो कैसे चलेगा... दो ही दिन में सूर्यदेव का घर से निकलना मुश्किल हो गया। आखिरकार हार कर उन्होंने देवराज के बंगले का रुख किया। देवराज से हाय-हैलो के बाद सूर्यदेव सीधे मतलब की बात पर आ गए और बोले, ये क्या हो रहा है महाराज... ऐसे अंधेरे में भला कब तक चलेगा। जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। एक तो ब्लैक आउट, ऊपर से कड़कड़ाती सर्दी। लोगों को नहाने-धोने में बड़ी दिक्कत पेश आ रही है। देवराज ने मुंह लटकाए हुए ही जवाब दिया- हम जानते हैं सन्नी डियर (देवराज इंद्र और सूर्यदेव एक ही गुरू के चेले थे। दोनों बैचमेट थे, इसलिए देवराज सूर्यदेव को प्यार से सनी कहते थे) । हम जानते हैं, जनता परेशान है। हम जानते हैं, आप लोग भी परेशान हैं। लेकिन मेरी चिंता भी नाहक नहीं है। भला आप ही बताइए. जब जिंदगी में डांस-म्यूजिक और पार्टी नहीं है, तो भला क्या जिंदगी है। रंभा, मेनका और उर्वशी के थके हुए पांवों की थिरकन अब हमारे सीने में जीने के अरमान नहीं जगाते। उनकी पायलों में अब छमाछम नहीं, सिर्फ कंपन शेष है। ऐसे में बताइए, जीने का सामान कहां से करें, कैसे करें। हर ओर जब नाउम्मीदी का अंधेरा है, तो हमें भला कैसे ये उजाले रास आ सकते हैं...
सूर्यदेव कॉलेज के दिनों से जानते थे कि देवराज एक नंबर के रसिक हैं। जनाब दो वक्त का खाना छोड़ सकते हैं, लेकिन एक वक्त का भी नाच-गाना नहीं छो़ड़ सकते। सो दिलासा देते हुए बोले, तो महाराज समस्या क्या है। आपके एक इशारे पर एक क्या हजार आइटम गर्ल हाजिर हो सकती हैं। भला देर किस बात की है। देवराज ने सूर्यदेव की ओर मुस्कुराते हुए कहा, हम जानते हैं सन्नी। लेकिन तुम समझ नहीं पा रहे हो। हमें कोई चालू टाईप की आइटम गर्ल नहीं चाहिए, बल्कि रंभा, मेनका और उर्वशी के लेवल की क्लासिक डांसर चाहिए। सूर्यदेव समझ गए कि बीमारी क्या है। देवराज भाई देवदास हो चुके हैं और चंद्रमुखी के डांस की तरह भाई को रंभा, मेनका और उर्वशी के डांस का चस्का लग चुका है। मौके की नजाकत भांपते हुए बोले- तो सर, दिक्कत क्या है। उन्हीं तीनों में से किसी को ये जिम्मेदारी सौंप दीजिए कि अपने जैसी ही काबिल डांसर खोज कर लाए। चाहें तो अखबार में इश्तेहार दे दीजिए। फोटो समेत एप्लीकेशन मंगाइए। जो शॉर्टलिस्ट हों, उनका ऑडिशन और स्क्रीन टेस्ट ले लीजिए।
ये सब सुनते ही देवराज की आंखे चमक गईं। लेकिन मन ही मन खुद को गालियां भी दीं कि इतना धांसू आइडिया हमेशा इसी ढक्कन के दिमाग में क्यों आता है। राजा मैं हूं, राज-काज का मेरा तजुर्बा भी इससे कहीं ज्यादा है। उसके बावजूद इसके नाम की तूती बोलती है। अपने मन के भाव छुपाते हुए देवराज ने बडे प्यार से सूर्यदेव को गले से लगा लिया और बोले, तुम्हारे पास मेरी हर परेशानी का हल है। इसीलिए में तुम्हें सबसे ज्यादा लाइक करता हूं। सूर्यदेव ने देवराज के शिकंजे से खुद को छुड़ाते हुए कहा- नहीं सर, ये सब तो आपके साथ काम करने का असर है। वर्ना बंदे में भला क्या खूबी है। हालांकि वो मन ही मन यही सोच रहे थे कि उन्हें लाइक करना देवराज की च्वाइस नहीं, मजबूरी है। वो तो कब के मंत्री परिषद से इस्तीफा दे चुके होते, लेकिन देवराज हर बार उन्हें पुरानी दोस्ती और साथ पढने की दुहाई देकर रोक लेते थे। कुल मिलाकर दोनों की दोस्ती गठबंधन की राजनीति की बड़ी सटीक मिसाल थी।
बहरहाल राज नर्तकी के स्क्रीन टेस्ट के लिए देवलोक के तमाम लीडिंग अखबारों में इश्तेहार दे दिए गए। स्क्रीनिंग कमेटी की कमान सौंपी गई उर्वशी, रंभा और मेनका को। चूंकि मेनका देवराज और सूर्यदेव दोनों की मुंह लगी थी, इसलिए उसे कमेटी की अध्यक्षता सौप दी गई। राजनर्तकी उर्वशी और रंभा बेचारी परेशान थीं। दोनों इस बात पर कुढ़े जा रही थी कि राज नर्तकी होने के बावजूद उनकी उपेक्षा की गई। लेकिन उनके पास कुढ़ने के अलावा कोई चारा नहीं था। दोनों पूर्व राजनर्तकी मेनका की पावर से वाकिफ थीं। इसलिए दोनों को डर था कि मेनका उनकी एक नहीं चलने देगी। वह स्क्रीन टेस्ट में सिर्फ अपनी उन चेलियों को ही मौका दिलवाएगी, जिन्हें वह अपने डांस स्कूल में ट्रेनिंग दे रही थी। ये भी किसी से छुपा नहीं था कि डांस स्कूल के लिए मेनका ने सरकारी जमीन और ग्रांट कैसे हासिल की थी। (जारी... अगले अंक में-- मेनका का डांस स्कूल)

1 टिप्पणी:

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

बहुत खूब पंडित थी। कथा सुनाते जाइये। हम अगली कड़ी का इंतजार कर रहे हैं।