मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

कथा पुराण-- भाग-1.... भतीजे की बगावत


बात काफी पुरानी है। ईसा और मूसा से भी कई साल पुरानी। पूरब के संपन्न एवं समृद्ध देश ढक्कन राष्ट्र में ढक्कन वंश का शासन था। आधुनिक इतिहासकार उपहास उड़ाने के प्रयोजन से ढक्कन वंश को कोई छोटा-मौटा कबीला साबित कर सकते हैं, लेकिन असल में वो एक बहुत बड़ा साम्राज्य था। इतना बड़ा कि उसकी सीमाएं अगल-बगल के कई गांवों को छूती थी। ढक्कन राष्ट्र की हिफाजत के लिए काफी बड़ी ढक्कन सेना थी। सदियों पहले भी वहां राजा मां के पेट से पैदा नहीं होता था, बल्कि उसे जनता चुनती थी। लेकिन एक परंपरा बरसों से चली आ रही थी- कि ढक्कन वंश का राजा वही बनता था, जिस पर कुलगुरू की कृपा होती थी। कुलगुरू यानी पार्टी सुप्रीमो। कहने को तो पार्टी के पदाधिकारियों की सूची काफी लंबी थी, लेकिन सत्ता का सुख उसे ही नसीब होता था, जिसे कुलगुरू चाहते थे। ये और बात है कि कुलगुरू ना खूद कभी सिंहासन पर बैठे और ना ही अपने परिवार के किसी सदस्य को मंत्री परिषद् में शामिल होने दिया। ये बात उनके बेटे को भी कचोटती थी और भतीजे को भी। लेकिन दोनों में इतना साहस नहीं था कि कुलगुरू के समक्ष अपने ह्दय के उदगार व्यक्त कर पाते। बेचारों के दिल के अरमान दिल में ही दफन रहते। ऐसा नहीं था कि कुलगुरू उनकी ख्वाहिशों से वाकिफ नहीं थे। लेकिन वो धर्मसंकट में थे कि आखिर किसे प्रोमोट करें- बेटे को या भतीजे को... सो इसी उधेड़बुन में वह जब तब दोनों को यही सबक देते कि बच्चों सत्ता से बड़ा संगठन होता है। ढक्कन राष्ट्र में सबसे बड़ा ढक्कन वो नहीं है, जिसके हाथ में देश की बागडोर हो, बल्कि सबसे ढक्कन वही माना जाता है, जिसके हाथ में राजा की डोर होती है। इसलिए हे वत्स, तुम लोग राजा बनने की मत सोचो, किंगमेकर बनो, जैसे कि मैं हूं। तुम्हारा परम दायित्व यह है कि देश में ढक्कन वंश की सत्ता बरकरार रखने के लिए तुम क्या योगदान दे सकते हो। लोगों को मजहब के नाम पर लड़ाओ, इलाके और भाषा के नाम पर अराजकता फैलाओ और फिर उनके कृपा निधान बनकर उनकी तकलीफें सुनो। फैसले करो। ढक्कन वंश के दोनों युवराज दम साधे कुलगुरू की बातें सुन रहे थे। कुलगुरू ने कोई रहस्य खोलने के अंदाज में कहा- ढक्कन राष्ट्र में दो तरह के लोग हैं। पहले वो, जो यहां के मूल निवासी हैं और दूसरे वो, जो यहां व्यापार अथवा जीविकोपार्जन के उद्देश्य से सुदूर क्षेत्रों से आए हुए हैं। पहले वालों से हमें जनबल अथवा बाहुबल मिलता है और दूसरे वाले हमें धनबल देते हैं।
कुलगुरू ने आगे कहा- एक बात हमेशा याद रखना कि धनबल देकर वो हम पर कोई अहसान नहीं करते हैं, बल्कि ढक्कन राष्ट्र के अन्न. हवा और पानी के उपयोग का मूल्य चुकाते हैं। हमने बरसों की मेहनत और लगन से स्थानीय निवासियों और बाहरी लोगों को आपस में लड़ने की आदत डाली है। आशा है कि तुम दोनों भी कुल की परंपरा को इसी तरह आगे बढाते रहोगे। और हां, उनके विवादों का फैसला करते वक्त निष्पक्ष बनने का जोखिम कभी मत लेना...अपने लोगों का पक्ष लेना। इससे ढक्कन राष्ट्र के मूल निवासियों के ह्दय में इंसाफ के प्रति आस्था बनी रहेगी और बाकी लोगों के दिल में मिल-जुल कर रहने की भावना बलवती होगी। वो लोग तनिक भयभीत रहेंगे। ठीक वैसे, जैसे आग को पानी का भय बना रहता है। कहने का भाव यह है मेरे बच्चों कि भय में बड़ी शक्ति है। इस शक्ति को पहचानो और शासन के मूल मंत्र को समझो।
कुलगुरू ने कहा और दोनों युवराजों ने उनके मंत्र को मस्तिष्क में उतार लिया। इस पूरे वार्तालाप के दौरान कुलगुरू ने अपने चश्मे-चरागों को सत्ता और शासन से जुड़ी कई और बारीकियां बताईं, लेकिन वह उन्हें कुलदेवी के श्राप के बारे में बताना भूल गए। श्राप ये था कि ढक्कन वंश के वंशज दुनिया में भले ही आग लगाते फिरें, लेकिन वो यदि गलती से भी आपस में लड़े तो पहले सत्ता से हाथ धोना पड़ेगा और फिर ढक्कन सेना दोफाड़ हो जाएगी। होनी को भला कौन टाल सकता था। कुलगुरू को पुत्रमोह ने घेरा तो वो भतीजे की उपेक्षा कर बैठे। भतीजा कुछ दिन तो घुटता रहा, लेकिन एक दिन वह बगावत का झंडा लेकर सड़क पर उतर आया। उसने कसम खाई कि यदि उसे सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली, तो वो ढक्कन वंश की ईंट से ईंट बजा देगा। कुलदेवी का श्राप सही निकला। पहले सत्ता का ह्लास हुआ, फिर ढक्कन सेना दोफाड़ हुई और अंतत ढक्कन वंश का नाश हो गया। लेकिन इसके बावजूद भतीजे की कसम पूरी नहीं हुई। तब से ढक्कन वंश का कुलगुरू, उसका बेटा और भतीजा हर युग में जन्म लेते हैं। अपने कुल की मर्यादा के अनुरूप दुनिया भर में आग लगाते हैं, जहां पैदा होते हैं-वहां स्थानीय और बाहरी लोगों के मुद्दे को हवा देकर सियासत करते हैं और फिर हमेशा की तरह आपस लड़-भिड़कर कट मरते हैं। इतिहास ने फिर करवट बदली है...इस बार ढक्कन वंश के कर्णाधारों ने मुंबई में अवतार लिया है.... कथा के तीनों किरदारों को आप पहचान तो गए ना...

1 टिप्पणी:

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

ढक्कन वंश के बारे में बड़े ही सलीके से बताया आपने। मजे की बात तो यह है कि ढक्कन वंश का साम्राज्य अब भी न सिर्फ कायम है, बल्कि पूरी तरह निरंकुश भी हो चला है।