इक राह हम चले, इक राह तुम चले
बढते चले गए दो दिलों के फासले
दिल में तड़प कर रह गयी मिलाने की आरजू
इस पार हम जले उस पार तुम जले...
बुधवार, २७ जून २००७
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Dagar mushkil hai, lekin chal pade hain to safar kat hi jayega aahista-aahista...
4 टिप्पणियाँ:
ये चार पंक्तियां अच्छी हैं, लेकिन उसके बाद क्या हुआ? अगर इसे विस्तार दें तो और भी अच्छा।
-रवींद्र रंजन
सर जी शख्सियत वालो ने ही तो गोरिया को मार दिया....
आरजू - में रवीन्द्र जी चार पंक्तियों के बाद होगा कि-
नीदें कहां से आएं बिस्तर पर करवटें हैं,
वहां तुम बदल रहे हो यहां हम बदल रहे हैं।
अब मिल जाइये दिल की तड़पन समाप्त हो जायगी। स्वागत है हिन्दी चिट्ठाजगत में।
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