शुक्रवार, 10 अगस्त 2007

अभाव (1998)

आज भी, दिन पहले की तरह पूरब से चलता है
थक-हार कर सूरज पश्चिम में ही ढलता है
पल-पल मेरा व्यस्तता के साये में पलता है
पर, दिल में कहीं गहरे, एक अभाव सा खलता है।।

आज भी, हर परिचित चेहरा हंस के मिलता है
अनजान शख्स उसी तरह बच के निकलता है
शिकवों की ज्वाला में जीवन क़तरा-क़तरा जलता है
पर, दिल में कहीं गहरे, एक अभाव सा खलता है।।

आज भी, वक्त रेत की भांति हाथों से फिसलता है
कुछ खोने के अहसास से ह्रदय दिन-रात सिसकता है
यूं तो साथ यादों का एक काफ़िला भी चलता है
पर, दिल में कहीं गहरे, एक अभाव सा खलता है।।

कहने को तो पूर्ववत्, सब सामान्य लगता है
पर, हल्का होने को मन अक्सर, किसी कंधे के लिये तरसता है
पश्चाताप की अग्नि में, अस्तित्व मेरा गलता है-
यकीन मानो, दिल में कहीं गहरे एक अभाव सा खलता है...
सचमुच नितांत व्यक्तिगत अभाव.......
11-04-98

3 टिप्‍पणियां:

Vikas ने कहा…

Well Mr. Kaushik, this is wonderful and simply takes any body inside himself to think this all, what you had written here, is his own story. You have described the frustration of a common person in a beautiful manner.
But, my advice to you here is that you put this energy and talent in some motivational poem instead of this kind of poem, which prep up more frustration inside the reader.

राजेश पुरक़ैफ ने कहा…

सचमुच सर सबके दिल में कुछ अपने व्क्ततिगत अभाव हैं। आपकी रचना पढ़कर मुझे भी कुछ मेरे अभाव याद आ गये और मन में एक टीस सी उठी।

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

ऐसा कई बार होता है कि जिंदगी के इस सफर में कई बार कुछ लोग पीछे छूट जाते हैं। कुछ अपने बिछड़ जाते हैं और कुछ अपने हमेशा के लिये अपने नहीं हो पाते हैं। कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनको खोने का एहसास हमें उम्र भर सालता रहता है। लेकिन जिंदगी फिर भी चलती रहती है। यही सच है। यही जिंदगी है।