बुधवार, 30 जनवरी 2008

मासूमों के जहन में पनपती साजिशें...

कहते हैं बच्चे मन के सच्चे होते हैं. लेकिन वक्त के साथ इस बात के मायने बदल रहे हैं। वक्त के साथ बदल रही है बच्चों की सोच, बदल रहा है बच्चों का नजरिया और बदल रहा है बच्चों का मिजाज। मासूमों के हाथों आए दिन होने वाली वारदात तो कम से कम यही इशारा करती है। कुछ महीने पहले गुड़गांव के एक स्कूल में आठवीं में पढ़ने वाले दो बच्चों ने अपने सहपाठी को गोली मार दी। 12-13 साल के उन लड़कों के बीच झगड़ा किसी मामूली बात पर शुरू हुआ था, लेकिन उसका अंजाम इतना भयानक हुआ कि किसी ने सोचा भी नहीं था। एक लड़के ने दूसरे को सबक सिखाने के लिए बाकायदा एक साजिश रची। उसने अपने पिता की अलमारी से पिस्तौल निकालकर बस्ते में रख ली और स्कूल पहुंचकर उसे बाथरूम में छुपा दिया। स्कूल की छुट्टी हुई तो उस लड़के ने बेखौफ अंदाज में अपने सहपाठी के सीने में कई गोलियां उतार दीं।
ऐसी ही एक साजिश रची थी अहमदाबाद के बंटी ने। 17 साल के बंटी ने पांच लाख की फिरौती के लिए अपने दोस्त लोकेश डडवानी को पहले अगवा किया और फिर अपना गुनाह छुपाने के लिए गला दबा कर उसकी हत्या कर दी। अब ताजा मामला, राजधानी दिल्ली का है। यहां सातवीं में पढ़ने वाले एक बच्चे सचिन (बदला हुआ नाम) ने अपने दोस्त धर्मेंद्र का अपहरण कर लिया। वो भी सिर्फ कुछ रुपयों के लिए। रुपये नहीं मिले, तो उसने अपने दोस्त की हत्या कर दी।
मासूम धर्मेंद्र अपने ही दोस्त की साजिश का शिकार बना और जान से हाथ धो बैठा। इस हादसे ने उसके घरवालों को अंदर तक हिला कर रख दिया है। बेटे की मौत ने उसकी मां को तो इस कदर बदहवास बना दिया है कि जो भी उसे दिलासा देने आता है, उससे वो सिर्फ एक ही सवाल पूछती हैं, मेरे धर्मेंद्र ने भला किसी का क्या बिगाड़ा था... क्यों उसे इतनी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। दरअसल मासूम धर्मेंद्र अपने मां-बाप की उम्मीदों का आखिरी सहारा था। चार साल पहले उनके बड़े बेटे ने खुदकुशी कर ली थी। बडे़ बेटे की मौत के जख्म अब तक हरे थे। ऐसे में धर्मेंद्र की मौत किसी सदमे के कम नहीं है। ऐसा सदमा, जिससे वो लोग शायद ही कभी उबर पाएं। लेकिन धर्मेंद्र के मां-बाप को जितना गम बेटे की मौत का है, उतना ही सदमा इस बात का भी है कि इनके बेटे की हत्या की साजिश उसके ही दोस्त ने रची। वो दोस्त, जिसकी उम्र महज 12 साल है। वो दोस्त, जो धर्मेंद्र के साथ पढ़ता था, साथ-साथ स्कूल जाता था और साथ-साथ खेलता था... वो दोस्त, जिसे धर्मेंद्र के मां-बाप ने भी हमेशा अपने बेटे जैसा समझा था। लेकिन क्या मालूम था कि 12 साल के सचिन की साजिश उनके घर का चिराग बुझा देगी। धर्मेंद्र की हत्या का आरोपी सचिन इस वक्त सलाखों के पीछे है, लेकिन इस खतरनाक साजिश का मास्टरमाइंड रिंकू अभी तक पुलिस गिरफ्त से बाहर है।
मासूम धर्मेंद्र के कत्ल की इस वारदात ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। इलाके के लोग ये जानकर सकते में हैं कि धर्मेंद्र के कत्ल की साजिश के सूत्रधार महज 12 से 14 साल के बच्चे हैं। साजिश भी ऐसी, कि जिसके प्लॉट या तो फिल्मों में मिलते हैं या फिर किसी जासूसी उपन्यासों में। लोग ये सोच कर हैरान हैं कि स्कूली बच्चों के जेहन में अपने ही दोस्त के अपहरण और हत्या की इतनी खतरनाक साजिश आखिर पनपी कैसे...वो भी उस उम्र में, जब ज्यादातर बच्चे अपहरण और फिरौती का मतलब तक ठीक से नहीं समझ पाते।
...तो क्या आज के बच्चे वक्त से पहले बड़े हो रहे हैं... क्या खेलने-कूदने की उम्र में वो गुनाह के खिलाड़ी बन रहे हैं... क्या उनके जहन में अब बचपने की शरारतों के स्थान पर साजिशें पनप रही हैं... जब-भी कोई मासूम गुनहगार बनता है, तो ये सवाल उठने लाजिमी हैं। आज के बच्चे कल के समाज का आइना हैं। और ये आइना जो तस्वीर दिखा रहा है, वो यकीकन बेहद खतरनाक है। आए दिन हो रहे वाकयात इशारा कर रहे हैं कि अगर आज हमने बुनियाद पर ध्यान नहीं दिया, तो कल गिरती हुई दीवार को देखने के सिवाय हमारे पास कोई चारा नहीं बचेगा।

1 टिप्पणी:

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

आपकी बात से मैं सौ फीसदी सहमत हूं। वाकई में आज के बच्चे वक्त से बड़े हो रहे हैं,लेकिन अगर बच्चों का दिमाग सृजनात्मक कामों में इस्तेमाल हो तो काफी अच्छे परिणाम सामने आ सकते हैं। कम उम्र में ही बड़े-बड़ों के कान काटने वाले कई बच्चों के उदाहरण हमारे सामने है। दुख की बात यह है कि आज के बच्चे निगेटिव चीजों की तरफ ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं। इसके बारे में अभिभावकों को गंभीरता से सोचना चाहिये।