देवलोक में सब जानते थे कि मेनका का अपना डांस स्कूल है। उसके डांस स्कूल की देवलोक में वही रेपुटेशन थी, जो रेपुटेशन बॉलीवुड में सरोज खान की डांस एकेडमी की है। लिहाजा उसके डांस स्कूल में देवलोक के धनवान और रसूखदार लोगों की बच्चियां ही डांस सीखने आती थीं। देवलोक का ऐसा कोई डांस कंपीटिशन नहीं था, जिसमें मैडम मेनका की चेलियों ने धाक ना जमाई हो। जाहिर है, मैडम मेनका दोनों हाथों से दौलत बटोर रही थीं। ये और बात है कि मैडम को ये स्कूल अपने बुरे दिनों में गुजर-बसर के लिए शुरू करना पड़ा था। दरअसल विश्वामित्र के साथ अफेयर के बाद राजनर्तकी मेनका देवलोक में अपना दर्जा खो बैठी थीं। पहले उसे राज नर्तकी के पद से हाथ धोना पड़ा और फिर देवलोक के नियमों के मुताबिक उससे सरकारी बंगला और गाड़ी भी छीन ली गई। देवराज बेचारे कलेजे पर पत्थर रखे ये सब देखते रहे। लेकिन कुछ कर नहीं पाए। एक बार तो सोचा, कि संविधान में संशोधन करवा कर मेनका के लिए कोई खास धारा जुड़वां दें कि उससे कोई सरकारी सुविधा वापस ना ली जाए। लेकिन मजबूर थे। अपनी पार्टी के अल्पमत में होने का उन्हें पहली बार अफसोस हो रहा था। डर था कि कहीं ये मुद्दा विदवत परिषद में न उठ जाए। किसी शरारती विरोधी ने अविश्वास प्रस्ताव रख दिया तो पास होना पक्का है। क्योंकि मेनका के साथ अपने अंतरंग रिश्तों की वजह से देवराज पहले ही काफी बदनाम हो चुके थे। देवराज को ये भी अंदेशा था कि उनके जिन विरोधियों को मेनका ने कभी घास नहीं डाली, उन्हें तो बस एक मौके का ही इंतजार है। देवराज जानते थे कि वह लोग देवलोक में बिजली-पानी और सड़क के मुद्दों पर भले ही खामोश रहते हों, लेकिन मेनका के मुद्दे पर उनकी सरकार पक्का गिरा देंगे।
यही सब सोच-सोच कर देवराज खामोश थे। उधर. मेनका ने न जाने कितनी बार कातर निगाहों से देवराज की ओर देखा, लेकिन कोई पॉजिटिव रेस्पांस नहीं मिला। रात-बेरात उन्हें फोन तक किए, लेकिन देवराज ने एक भी कॉल रिसीव नहीं की। हर बार उसे एक ही आवाज सुनाई देती--डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है, कृपा थोड़ी देर बाद डायल करें....हद तो तब हो गई जब मेनका के फोन करने पर देवराज का नंबर स्विच ऑफ आने लगा। मेनका को वो वक्त याद आने लगा जब मेनका की एक मिस्ड कॉल पर देवराज उसे फौरन फोन करते थे और फिर भोर होने तक दोनों के बीच मीठी-मीठी बातें होती थीं। देवराज मेनका के सामने अपने दिल के तमाम राज खोल कर रख देते थे और मेनका... मेनका तो देवराज को ऐसी-ऐसी बातें बताती थी कि उनकी होश फाख्ता हो जाते थे। मेनका उनके दरबारियों का कच्चा-चिट्ठा खोल कर रख देती थी। यानी मेनका देवराज की प्रेयसी कम मुखबिर ज्यादा थी। भाव-विभोर देवराज मैडम मेनका की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते थे, लेकिन कुछ ही दिन में सब बदल गया।
बार-बार गुहार का भी जब कोई असर नहीं हुआ, तो मैडम मेनका ने देवराज को जीभर के गालियां दीं। यानी देवराज की सरकार तो गिरने से बच गई, लेकिन वो खुद अपनी हॉट फेवरेट मेनका की नजरों से गिर गए। कुछ दिन बाद मेनका को समझना पड़ा कि ये सारा दोष उम्र का है। उम्र ढलने लगी है, इसीलिए उसके कजरे में अब पहले जैसी धार नहीं रही। वर्ना एक जमाना था जब उसकी एक नजर से पूरे देवलोक में मार-काट मच जाती थी। सचमुच... सब दिन होत ना एक समान। ऐसे में उसके सामने मसीहा बनकर आए-सूर्यदेव। वक्त की मारी मेनका को सूर्यदेव ने खुद ही मदद ऑफर की थी। शुरूआत में मेनका को सूर्यदेव की मदद लेने में थोड़ी झिझक हुई, क्योंकि मेनका की रिपोर्ट पर ना जाने कितनी बार देवराज ने सूर्यदेव की वॉट लगाई थी। मेनका अच्छी तरह जानती थी कि उसकी मुखबिरी ने ना जाने कितनी बार सूर्यदेव की चाल उलट दी थी। लेकिन उसके लिए अच्छी खबर ये थी कि सूर्यदेव उसकी साजिशों से बेखबर थे। दरअसल वो तो मेनका की अदाओं के कायल थे, इसलिए उसके करीब आने का मौका चाहते थे। सूर्यदेव जानते थे तो सिर्फ इतना कि मेनका के दिल में उतरने का इससे बेहतरीन मौका उन्हें फिर कभी नहीं मिलेगा। मजबूरी ने मेनका को भी सूर्यदेव के करीब ला दिया। दोनों की नजदीकियों ने जल्द ही असर दिखाया। सूर्यदेव ने अपने सियासी रसूख की धौंस दिखाकर देवराज के सामने शर्त रख दी कि सरकारी सेवाओं से महरूम की गईं मेनका का राजनर्तकी वाला दर्जा बहाल हो। उन्हें सभी सुविधाएं बा-इज्जत लौटाई जाएं।
ये तमाम ऐसी बातें थीं, जो मेनका के लिए देवराज के दिल में थीं। लेकिन बदले हुए हालात में उनके दिल के जज्बात भी बदल गए। आखिर इतने बरसों से राज कर रहे थे, कोई झक नहीं मार रहे थे। वो इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि अगर इस वक्त मेनका का पुराना दर्जा बहाल हुआ तो सारा क्रेडिट उनके निकटम प्रतिद्वंद्वी सूर्यदेव को मिलेगा। मेनका की नजरों से तो गिर ही चुके थे, अब सूर्यदेव के सामने किरकिरी कैसे करवा लेते। सो उन्हें फौरन संविधान सभा की याद आई। संविधान सभा की दुहाई देकर देवराज ने सूर्यदेव को समझाया कि मित्र मेनका से मुझे भी हमदर्दी है, लेकिन विश्वामित्र से मोहब्बत करके मेनका ने देवलोक के कायदे कानून तोड़े हैं। ऐसे में यदि हमने उसका दर्जा बहाल किया तो आपकी, हमारी और सरकार की जग हंसाई होगी। सूर्यदेव हर काम को जरा छुपकर करने में यकीन रखते थे। इसीलिए तमाम तरह शौक रखने के बावजूद उनकी सार्वजनिक छवि साफ सुथरी थी। बात जब इमेज की आई तो उन्हें मेनका की खातिर देवराज से टकराने में समझदारी नजर नहीं आई। लेकिन मेनका को जबान दे चुके थे। सो अपनी शर्त को जरा का लाइट करते हुए बीच-बचाव का रास्ता अपनाने की बात कही। देवराज तैयार हो गए। आखिरकार वो भी मेनका की नजरों में अपनी खोई हुई जगह फिर से पाना चाहते थे। लंबी मंत्रणा के बाद देवराज और सूर्यदेव ने तय किया कि फिलहाल मेनका को राजप्रासाद से दूर कहीं जमीन देकर एक आश्रम खुलवा देते हैं। जनता की यादाश्त कमजोर होती है। कुछ दिन बाद जब मामला शांत हो जाएगा, तो उसके नृत्य कौशल को पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया जाएगा। पाठ्य पुस्तकों के जरिए ये पढ़ाया जाएगा कि मेनका विश्वामित्र के पास अपनी मर्जी से नहीं गई थी, बल्कि राजाज्ञा से उसे ऐसा करना पड़ा। सत्ता के शीर्ष पर बैठे देवराज और सूर्य़देव ने जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ। कुछ दिनों में मेनका के पक्ष में हमदर्दी का माहौल बन गया। जिस आश्रम को मेनका अपने बुढ़ापे का ठिकाना मान रही थी, वो आश्रम से डांस स्कूल बन गया।
(जारी... अगले अंक में--- मेनका का बदला)
शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008
गुरुवार, 7 फ़रवरी 2008
कथा पुराण-- भाग-1 ...नाच बिना सब सून
पूरे देवलोक में अंधेरा छाया हुआ था। लोग हैरान परेशान थे कि सभी हाइड्रोलिक पावर प्लांट सही काम कर रहे थे, फिर भी अंधेरा क्यों है। बेचारे इस बात से अनभिज्ञ थे कि देवलोक में अंधेरे का मूल कारण था- देवराज इंद्र का खराब मूड। कई दिनों से देवराज के चेहरे पर 12 बजे थे। हर वक्त उन्हें बस एक ही चिंता खाए जा रही थी कि रंभा, मेनका और उर्वशी के बूढ़ी होने के बाद उनके दरबार में डांस आइटम कौन पेश करेगा। इसी फिक्र में उन्होंने पूरे देवलोक में ब्लैक आउट का ऐलान कर रखा था। अब देवलोक में उजाला तभी संभव था जब देवराज को कोई उम्मीद की किरण दिखाए और उनके लिए राजनर्तकी का प्रबंध करे। देवराज के इस ऐलान से सबसे ज्यादा परेशान बिजली मंत्री सूर्यदेव थे। हों भी क्यों नहीं, पूरी मंत्री परिषद तानों से उनका कलेजा छलनी किए दे रही थी। सबकी जुबां पर एक बात थी- क्या सर, आपके राज में भी सूरज तले अंधेरा रहेगा तो कैसे चलेगा... दो ही दिन में सूर्यदेव का घर से निकलना मुश्किल हो गया। आखिरकार हार कर उन्होंने देवराज के बंगले का रुख किया। देवराज से हाय-हैलो के बाद सूर्यदेव सीधे मतलब की बात पर आ गए और बोले, ये क्या हो रहा है महाराज... ऐसे अंधेरे में भला कब तक चलेगा। जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। एक तो ब्लैक आउट, ऊपर से कड़कड़ाती सर्दी। लोगों को नहाने-धोने में बड़ी दिक्कत पेश आ रही है। देवराज ने मुंह लटकाए हुए ही जवाब दिया- हम जानते हैं सन्नी डियर (देवराज इंद्र और सूर्यदेव एक ही गुरू के चेले थे। दोनों बैचमेट थे, इसलिए देवराज सूर्यदेव को प्यार से सनी कहते थे) । हम जानते हैं, जनता परेशान है। हम जानते हैं, आप लोग भी परेशान हैं। लेकिन मेरी चिंता भी नाहक नहीं है। भला आप ही बताइए. जब जिंदगी में डांस-म्यूजिक और पार्टी नहीं है, तो भला क्या जिंदगी है। रंभा, मेनका और उर्वशी के थके हुए पांवों की थिरकन अब हमारे सीने में जीने के अरमान नहीं जगाते। उनकी पायलों में अब छमाछम नहीं, सिर्फ कंपन शेष है। ऐसे में बताइए, जीने का सामान कहां से करें, कैसे करें। हर ओर जब नाउम्मीदी का अंधेरा है, तो हमें भला कैसे ये उजाले रास आ सकते हैं...
सूर्यदेव कॉलेज के दिनों से जानते थे कि देवराज एक नंबर के रसिक हैं। जनाब दो वक्त का खाना छोड़ सकते हैं, लेकिन एक वक्त का भी नाच-गाना नहीं छो़ड़ सकते। सो दिलासा देते हुए बोले, तो महाराज समस्या क्या है। आपके एक इशारे पर एक क्या हजार आइटम गर्ल हाजिर हो सकती हैं। भला देर किस बात की है। देवराज ने सूर्यदेव की ओर मुस्कुराते हुए कहा, हम जानते हैं सन्नी। लेकिन तुम समझ नहीं पा रहे हो। हमें कोई चालू टाईप की आइटम गर्ल नहीं चाहिए, बल्कि रंभा, मेनका और उर्वशी के लेवल की क्लासिक डांसर चाहिए। सूर्यदेव समझ गए कि बीमारी क्या है। देवराज भाई देवदास हो चुके हैं और चंद्रमुखी के डांस की तरह भाई को रंभा, मेनका और उर्वशी के डांस का चस्का लग चुका है। मौके की नजाकत भांपते हुए बोले- तो सर, दिक्कत क्या है। उन्हीं तीनों में से किसी को ये जिम्मेदारी सौंप दीजिए कि अपने जैसी ही काबिल डांसर खोज कर लाए। चाहें तो अखबार में इश्तेहार दे दीजिए। फोटो समेत एप्लीकेशन मंगाइए। जो शॉर्टलिस्ट हों, उनका ऑडिशन और स्क्रीन टेस्ट ले लीजिए।
ये सब सुनते ही देवराज की आंखे चमक गईं। लेकिन मन ही मन खुद को गालियां भी दीं कि इतना धांसू आइडिया हमेशा इसी ढक्कन के दिमाग में क्यों आता है। राजा मैं हूं, राज-काज का मेरा तजुर्बा भी इससे कहीं ज्यादा है। उसके बावजूद इसके नाम की तूती बोलती है। अपने मन के भाव छुपाते हुए देवराज ने बडे प्यार से सूर्यदेव को गले से लगा लिया और बोले, तुम्हारे पास मेरी हर परेशानी का हल है। इसीलिए में तुम्हें सबसे ज्यादा लाइक करता हूं। सूर्यदेव ने देवराज के शिकंजे से खुद को छुड़ाते हुए कहा- नहीं सर, ये सब तो आपके साथ काम करने का असर है। वर्ना बंदे में भला क्या खूबी है। हालांकि वो मन ही मन यही सोच रहे थे कि उन्हें लाइक करना देवराज की च्वाइस नहीं, मजबूरी है। वो तो कब के मंत्री परिषद से इस्तीफा दे चुके होते, लेकिन देवराज हर बार उन्हें पुरानी दोस्ती और साथ पढने की दुहाई देकर रोक लेते थे। कुल मिलाकर दोनों की दोस्ती गठबंधन की राजनीति की बड़ी सटीक मिसाल थी।
बहरहाल राज नर्तकी के स्क्रीन टेस्ट के लिए देवलोक के तमाम लीडिंग अखबारों में इश्तेहार दे दिए गए। स्क्रीनिंग कमेटी की कमान सौंपी गई उर्वशी, रंभा और मेनका को। चूंकि मेनका देवराज और सूर्यदेव दोनों की मुंह लगी थी, इसलिए उसे कमेटी की अध्यक्षता सौप दी गई। राजनर्तकी उर्वशी और रंभा बेचारी परेशान थीं। दोनों इस बात पर कुढ़े जा रही थी कि राज नर्तकी होने के बावजूद उनकी उपेक्षा की गई। लेकिन उनके पास कुढ़ने के अलावा कोई चारा नहीं था। दोनों पूर्व राजनर्तकी मेनका की पावर से वाकिफ थीं। इसलिए दोनों को डर था कि मेनका उनकी एक नहीं चलने देगी। वह स्क्रीन टेस्ट में सिर्फ अपनी उन चेलियों को ही मौका दिलवाएगी, जिन्हें वह अपने डांस स्कूल में ट्रेनिंग दे रही थी। ये भी किसी से छुपा नहीं था कि डांस स्कूल के लिए मेनका ने सरकारी जमीन और ग्रांट कैसे हासिल की थी। (जारी... अगले अंक में-- मेनका का डांस स्कूल)
सूर्यदेव कॉलेज के दिनों से जानते थे कि देवराज एक नंबर के रसिक हैं। जनाब दो वक्त का खाना छोड़ सकते हैं, लेकिन एक वक्त का भी नाच-गाना नहीं छो़ड़ सकते। सो दिलासा देते हुए बोले, तो महाराज समस्या क्या है। आपके एक इशारे पर एक क्या हजार आइटम गर्ल हाजिर हो सकती हैं। भला देर किस बात की है। देवराज ने सूर्यदेव की ओर मुस्कुराते हुए कहा, हम जानते हैं सन्नी। लेकिन तुम समझ नहीं पा रहे हो। हमें कोई चालू टाईप की आइटम गर्ल नहीं चाहिए, बल्कि रंभा, मेनका और उर्वशी के लेवल की क्लासिक डांसर चाहिए। सूर्यदेव समझ गए कि बीमारी क्या है। देवराज भाई देवदास हो चुके हैं और चंद्रमुखी के डांस की तरह भाई को रंभा, मेनका और उर्वशी के डांस का चस्का लग चुका है। मौके की नजाकत भांपते हुए बोले- तो सर, दिक्कत क्या है। उन्हीं तीनों में से किसी को ये जिम्मेदारी सौंप दीजिए कि अपने जैसी ही काबिल डांसर खोज कर लाए। चाहें तो अखबार में इश्तेहार दे दीजिए। फोटो समेत एप्लीकेशन मंगाइए। जो शॉर्टलिस्ट हों, उनका ऑडिशन और स्क्रीन टेस्ट ले लीजिए।
ये सब सुनते ही देवराज की आंखे चमक गईं। लेकिन मन ही मन खुद को गालियां भी दीं कि इतना धांसू आइडिया हमेशा इसी ढक्कन के दिमाग में क्यों आता है। राजा मैं हूं, राज-काज का मेरा तजुर्बा भी इससे कहीं ज्यादा है। उसके बावजूद इसके नाम की तूती बोलती है। अपने मन के भाव छुपाते हुए देवराज ने बडे प्यार से सूर्यदेव को गले से लगा लिया और बोले, तुम्हारे पास मेरी हर परेशानी का हल है। इसीलिए में तुम्हें सबसे ज्यादा लाइक करता हूं। सूर्यदेव ने देवराज के शिकंजे से खुद को छुड़ाते हुए कहा- नहीं सर, ये सब तो आपके साथ काम करने का असर है। वर्ना बंदे में भला क्या खूबी है। हालांकि वो मन ही मन यही सोच रहे थे कि उन्हें लाइक करना देवराज की च्वाइस नहीं, मजबूरी है। वो तो कब के मंत्री परिषद से इस्तीफा दे चुके होते, लेकिन देवराज हर बार उन्हें पुरानी दोस्ती और साथ पढने की दुहाई देकर रोक लेते थे। कुल मिलाकर दोनों की दोस्ती गठबंधन की राजनीति की बड़ी सटीक मिसाल थी।
बहरहाल राज नर्तकी के स्क्रीन टेस्ट के लिए देवलोक के तमाम लीडिंग अखबारों में इश्तेहार दे दिए गए। स्क्रीनिंग कमेटी की कमान सौंपी गई उर्वशी, रंभा और मेनका को। चूंकि मेनका देवराज और सूर्यदेव दोनों की मुंह लगी थी, इसलिए उसे कमेटी की अध्यक्षता सौप दी गई। राजनर्तकी उर्वशी और रंभा बेचारी परेशान थीं। दोनों इस बात पर कुढ़े जा रही थी कि राज नर्तकी होने के बावजूद उनकी उपेक्षा की गई। लेकिन उनके पास कुढ़ने के अलावा कोई चारा नहीं था। दोनों पूर्व राजनर्तकी मेनका की पावर से वाकिफ थीं। इसलिए दोनों को डर था कि मेनका उनकी एक नहीं चलने देगी। वह स्क्रीन टेस्ट में सिर्फ अपनी उन चेलियों को ही मौका दिलवाएगी, जिन्हें वह अपने डांस स्कूल में ट्रेनिंग दे रही थी। ये भी किसी से छुपा नहीं था कि डांस स्कूल के लिए मेनका ने सरकारी जमीन और ग्रांट कैसे हासिल की थी। (जारी... अगले अंक में-- मेनका का डांस स्कूल)
मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008
कथा पुराण-- भाग-1.... भतीजे की बगावत

बात काफी पुरानी है। ईसा और मूसा से भी कई साल पुरानी। पूरब के संपन्न एवं समृद्ध देश ढक्कन राष्ट्र में ढक्कन वंश का शासन था। आधुनिक इतिहासकार उपहास उड़ाने के प्रयोजन से ढक्कन वंश को कोई छोटा-मौटा कबीला साबित कर सकते हैं, लेकिन असल में वो एक बहुत बड़ा साम्राज्य था। इतना बड़ा कि उसकी सीमाएं अगल-बगल के कई गांवों को छूती थी। ढक्कन राष्ट्र की हिफाजत के लिए काफी बड़ी ढक्कन सेना थी। सदियों पहले भी वहां राजा मां के पेट से पैदा नहीं होता था, बल्कि उसे जनता चुनती थी। लेकिन एक परंपरा बरसों से चली आ रही थी- कि ढक्कन वंश का राजा वही बनता था, जिस पर कुलगुरू की कृपा होती थी। कुलगुरू यानी पार्टी सुप्रीमो। कहने को तो पार्टी के पदाधिकारियों की सूची काफी लंबी थी, लेकिन सत्ता का सुख उसे ही नसीब होता था, जिसे कुलगुरू चाहते थे। ये और बात है कि कुलगुरू ना खूद कभी सिंहासन पर बैठे और ना ही अपने परिवार के किसी सदस्य को मंत्री परिषद् में शामिल होने दिया। ये बात उनके बेटे को भी कचोटती थी और भतीजे को भी। लेकिन दोनों में इतना साहस नहीं था कि कुलगुरू के समक्ष अपने ह्दय के उदगार व्यक्त कर पाते। बेचारों के दिल के अरमान दिल में ही दफन रहते। ऐसा नहीं था कि कुलगुरू उनकी ख्वाहिशों से वाकिफ नहीं थे। लेकिन वो धर्मसंकट में थे कि आखिर किसे प्रोमोट करें- बेटे को या भतीजे को... सो इसी उधेड़बुन में वह जब तब दोनों को यही सबक देते कि बच्चों सत्ता से बड़ा संगठन होता है। ढक्कन राष्ट्र में सबसे बड़ा ढक्कन वो नहीं है, जिसके हाथ में देश की बागडोर हो, बल्कि सबसे ढक्कन वही माना जाता है, जिसके हाथ में राजा की डोर होती है। इसलिए हे वत्स, तुम लोग राजा बनने की मत सोचो, किंगमेकर बनो, जैसे कि मैं हूं। तुम्हारा परम दायित्व यह है कि देश में ढक्कन वंश की सत्ता बरकरार रखने के लिए तुम क्या योगदान दे सकते हो। लोगों को मजहब के नाम पर लड़ाओ, इलाके और भाषा के नाम पर अराजकता फैलाओ और फिर उनके कृपा निधान बनकर उनकी तकलीफें सुनो। फैसले करो। ढक्कन वंश के दोनों युवराज दम साधे कुलगुरू की बातें सुन रहे थे। कुलगुरू ने कोई रहस्य खोलने के अंदाज में कहा- ढक्कन राष्ट्र में दो तरह के लोग हैं। पहले वो, जो यहां के मूल निवासी हैं और दूसरे वो, जो यहां व्यापार अथवा जीविकोपार्जन के उद्देश्य से सुदूर क्षेत्रों से आए हुए हैं। पहले वालों से हमें जनबल अथवा बाहुबल मिलता है और दूसरे वाले हमें धनबल देते हैं।
कुलगुरू ने आगे कहा- एक बात हमेशा याद रखना कि धनबल देकर वो हम पर कोई अहसान नहीं करते हैं, बल्कि ढक्कन राष्ट्र के अन्न. हवा और पानी के उपयोग का मूल्य चुकाते हैं। हमने बरसों की मेहनत और लगन से स्थानीय निवासियों और बाहरी लोगों को आपस में लड़ने की आदत डाली है। आशा है कि तुम दोनों भी कुल की परंपरा को इसी तरह आगे बढाते रहोगे। और हां, उनके विवादों का फैसला करते वक्त निष्पक्ष बनने का जोखिम कभी मत लेना...अपने लोगों का पक्ष लेना। इससे ढक्कन राष्ट्र के मूल निवासियों के ह्दय में इंसाफ के प्रति आस्था बनी रहेगी और बाकी लोगों के दिल में मिल-जुल कर रहने की भावना बलवती होगी। वो लोग तनिक भयभीत रहेंगे। ठीक वैसे, जैसे आग को पानी का भय बना रहता है। कहने का भाव यह है मेरे बच्चों कि भय में बड़ी शक्ति है। इस शक्ति को पहचानो और शासन के मूल मंत्र को समझो।
कुलगुरू ने कहा और दोनों युवराजों ने उनके मंत्र को मस्तिष्क में उतार लिया। इस पूरे वार्तालाप के दौरान कुलगुरू ने अपने चश्मे-चरागों को सत्ता और शासन से जुड़ी कई और बारीकियां बताईं, लेकिन वह उन्हें कुलदेवी के श्राप के बारे में बताना भूल गए। श्राप ये था कि ढक्कन वंश के वंशज दुनिया में भले ही आग लगाते फिरें, लेकिन वो यदि गलती से भी आपस में लड़े तो पहले सत्ता से हाथ धोना पड़ेगा और फिर ढक्कन सेना दोफाड़ हो जाएगी। होनी को भला कौन टाल सकता था। कुलगुरू को पुत्रमोह ने घेरा तो वो भतीजे की उपेक्षा कर बैठे। भतीजा कुछ दिन तो घुटता रहा, लेकिन एक दिन वह बगावत का झंडा लेकर सड़क पर उतर आया। उसने कसम खाई कि यदि उसे सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली, तो वो ढक्कन वंश की ईंट से ईंट बजा देगा। कुलदेवी का श्राप सही निकला। पहले सत्ता का ह्लास हुआ, फिर ढक्कन सेना दोफाड़ हुई और अंतत ढक्कन वंश का नाश हो गया। लेकिन इसके बावजूद भतीजे की कसम पूरी नहीं हुई। तब से ढक्कन वंश का कुलगुरू, उसका बेटा और भतीजा हर युग में जन्म लेते हैं। अपने कुल की मर्यादा के अनुरूप दुनिया भर में आग लगाते हैं, जहां पैदा होते हैं-वहां स्थानीय और बाहरी लोगों के मुद्दे को हवा देकर सियासत करते हैं और फिर हमेशा की तरह आपस लड़-भिड़कर कट मरते हैं। इतिहास ने फिर करवट बदली है...इस बार ढक्कन वंश के कर्णाधारों ने मुंबई में अवतार लिया है.... कथा के तीनों किरदारों को आप पहचान तो गए ना...
कुलगुरू ने आगे कहा- एक बात हमेशा याद रखना कि धनबल देकर वो हम पर कोई अहसान नहीं करते हैं, बल्कि ढक्कन राष्ट्र के अन्न. हवा और पानी के उपयोग का मूल्य चुकाते हैं। हमने बरसों की मेहनत और लगन से स्थानीय निवासियों और बाहरी लोगों को आपस में लड़ने की आदत डाली है। आशा है कि तुम दोनों भी कुल की परंपरा को इसी तरह आगे बढाते रहोगे। और हां, उनके विवादों का फैसला करते वक्त निष्पक्ष बनने का जोखिम कभी मत लेना...अपने लोगों का पक्ष लेना। इससे ढक्कन राष्ट्र के मूल निवासियों के ह्दय में इंसाफ के प्रति आस्था बनी रहेगी और बाकी लोगों के दिल में मिल-जुल कर रहने की भावना बलवती होगी। वो लोग तनिक भयभीत रहेंगे। ठीक वैसे, जैसे आग को पानी का भय बना रहता है। कहने का भाव यह है मेरे बच्चों कि भय में बड़ी शक्ति है। इस शक्ति को पहचानो और शासन के मूल मंत्र को समझो।
कुलगुरू ने कहा और दोनों युवराजों ने उनके मंत्र को मस्तिष्क में उतार लिया। इस पूरे वार्तालाप के दौरान कुलगुरू ने अपने चश्मे-चरागों को सत्ता और शासन से जुड़ी कई और बारीकियां बताईं, लेकिन वह उन्हें कुलदेवी के श्राप के बारे में बताना भूल गए। श्राप ये था कि ढक्कन वंश के वंशज दुनिया में भले ही आग लगाते फिरें, लेकिन वो यदि गलती से भी आपस में लड़े तो पहले सत्ता से हाथ धोना पड़ेगा और फिर ढक्कन सेना दोफाड़ हो जाएगी। होनी को भला कौन टाल सकता था। कुलगुरू को पुत्रमोह ने घेरा तो वो भतीजे की उपेक्षा कर बैठे। भतीजा कुछ दिन तो घुटता रहा, लेकिन एक दिन वह बगावत का झंडा लेकर सड़क पर उतर आया। उसने कसम खाई कि यदि उसे सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली, तो वो ढक्कन वंश की ईंट से ईंट बजा देगा। कुलदेवी का श्राप सही निकला। पहले सत्ता का ह्लास हुआ, फिर ढक्कन सेना दोफाड़ हुई और अंतत ढक्कन वंश का नाश हो गया। लेकिन इसके बावजूद भतीजे की कसम पूरी नहीं हुई। तब से ढक्कन वंश का कुलगुरू, उसका बेटा और भतीजा हर युग में जन्म लेते हैं। अपने कुल की मर्यादा के अनुरूप दुनिया भर में आग लगाते हैं, जहां पैदा होते हैं-वहां स्थानीय और बाहरी लोगों के मुद्दे को हवा देकर सियासत करते हैं और फिर हमेशा की तरह आपस लड़-भिड़कर कट मरते हैं। इतिहास ने फिर करवट बदली है...इस बार ढक्कन वंश के कर्णाधारों ने मुंबई में अवतार लिया है.... कथा के तीनों किरदारों को आप पहचान तो गए ना...
शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008
कहानी मल्लिका की
ये कहानी है मल्लिका की। न..न..न बॉलीवुड सुंदरी मल्लिका की नहीं, गुनाह की मल्लिका की। मल्लिका यानी एक ऐसी औरत जिसके लिए शातिर, बेरहम, बेदर्द और जालिम जैसे शब्द भी हल्के लगते हैं। जुर्म की दुनिया में उसके जैसी दूसरी औरत की मिसाल अब तक नहीं मिली है। बैंगलोर (अब बैंगलुरू) की रहने वाली मल्लिका न कोई वक्त की मारी अबला है और न ही समाज की सताई बेबस औरत, कि जिसे मजबूरी में गुनाह का रास्ता अख्तियार करना पड़ा हो। बल्कि उसे गुनाहगार बनाया दौलत की हवस ने। थोड़े वक्त में ज्यादा दौलत कमाने के लालच ने मल्लिका को कहीं का नहीं छोड़ा।
करीब 12 साल पहले तक मल्लिका एक सीधी-सादी औरत थी। बैंगलोर के कगलीपुरा इलाके में वह अपने पति और बच्चों के साथ खुश थी। पति इतना तो कमा ही लेता था कि पूरे परिवार को दो वक्त की दाल-रोटी आराम से मिल जाती थी। लेकिन मल्लिका ऐशो-आराम की जिंदगी चाहती थी। और इसके लिए जरूरत थी दौलत की। रातों-रात दौलत कमाने के लिए उसने एक चिट फंड कंपनी शुरू कर दी। पति समेत पूरा परिवार इसके खिलाफ था, लेकिन मल्लिका जिद पर अड़ी थी। 1995 से 1998 तक उसने चिटफंड कंपनी चलाई। शुरू में तो सब ठीक-ठाक चला। उसके बाद चिट फंड कंपनी घाटे में आ गई और मल्लिका कर्ज में डूब गई। लोगों का कर्ज चुकाने के लिए मल्लिका अपने ही घर में चोरी करने लगी। बार-बार मना करने पर भी जब वह बाज नहीं आई, तो पति ने उसे घर से निकाल दिया।
उधर, लेनदार अपना पैसा वापस मांग रहे थे। लेकिन मल्लिका के पास उन्हें लौटाने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं थी। तब उसने एक खौफनाक रास्ता अख्तियार किया। रास्ता लूटपाट का। वो खुद एक औरत थी, लिहाजा उसने अपना टारगेट भी औरतों को ही बनाना शुरू कर दिया, उनमें ज्यादातर उम्रदराज औरतें शामिल थीं। वह पूजा-पाठ के बहाने बुजुर्ग औरतों को भरोसे में लेती और फिर मौका मिलते ही सायनाइड खिलाकर उसका काम-तमाम कर देती थी। जी हां, सायनाइड यानी ऐसा खतरनाक जहर, जो इंसान के अंदर जाते ही उसका दम बाहर कर देता है। शातिर मल्लिका जानती थी कि शिकार के जिंदा रहते लूटपाट मुमकिन नहीं, फिर वो गुनाह के बाद कोई सबूत नहीं छोड़ना चाहती थी। इसीलिए पहले वो हत्या करती थी और फिर लूटपाट करके गायब हो जाती थी।
करीब आठ साल पहले 1999 में उसने ममता नाम की एक महिला को अपना पहला शिकार बनाया। मल्लिका ने उसकी हत्या कर दी और उसके गहने बेचकर कुछ लोगों का कर्ज चुका दिया। कत्ल के महीनों बाद भी वो पकड़ी नहीं गई, तो उसका हौंसला बढ़ गया। दो साल बाद उसने पूजा-पाठ के बहाने एक परिवार को अपना निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन इस बार वो पकड़ी गई। मल्लिका को छह महीने की सजा हुई। जेल से छूटने के बाद कुछ दिन उसने घरों में नौकरानी का काम किया। लेकिन पैसों की किल्लत होते ही उसने फिर एक महिला की हत्या कर दी। मल्लिका ने एक के बाद एक करके चार कत्ल किए। लेकिन इस बार एक मोबाइल फोन ने उसे पुलिस के जाल में फंसा दिया। दरअसल एक महिला की हत्या के बाद वो उसका मोबाइल फोन भी अपने साथ ले गई और उसे बेचने के चक्कर में पुलिस की गिरफ्त में आ गई। फिलहाल मल्लिका ने छह औरतों को सायनाइड देकर मारने की बात कबूली है। लेकिन पुलिस को शक है कि यह फेहरिस्त और लंबी हो सकती है।
करीब 12 साल पहले तक मल्लिका एक सीधी-सादी औरत थी। बैंगलोर के कगलीपुरा इलाके में वह अपने पति और बच्चों के साथ खुश थी। पति इतना तो कमा ही लेता था कि पूरे परिवार को दो वक्त की दाल-रोटी आराम से मिल जाती थी। लेकिन मल्लिका ऐशो-आराम की जिंदगी चाहती थी। और इसके लिए जरूरत थी दौलत की। रातों-रात दौलत कमाने के लिए उसने एक चिट फंड कंपनी शुरू कर दी। पति समेत पूरा परिवार इसके खिलाफ था, लेकिन मल्लिका जिद पर अड़ी थी। 1995 से 1998 तक उसने चिटफंड कंपनी चलाई। शुरू में तो सब ठीक-ठाक चला। उसके बाद चिट फंड कंपनी घाटे में आ गई और मल्लिका कर्ज में डूब गई। लोगों का कर्ज चुकाने के लिए मल्लिका अपने ही घर में चोरी करने लगी। बार-बार मना करने पर भी जब वह बाज नहीं आई, तो पति ने उसे घर से निकाल दिया।
उधर, लेनदार अपना पैसा वापस मांग रहे थे। लेकिन मल्लिका के पास उन्हें लौटाने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं थी। तब उसने एक खौफनाक रास्ता अख्तियार किया। रास्ता लूटपाट का। वो खुद एक औरत थी, लिहाजा उसने अपना टारगेट भी औरतों को ही बनाना शुरू कर दिया, उनमें ज्यादातर उम्रदराज औरतें शामिल थीं। वह पूजा-पाठ के बहाने बुजुर्ग औरतों को भरोसे में लेती और फिर मौका मिलते ही सायनाइड खिलाकर उसका काम-तमाम कर देती थी। जी हां, सायनाइड यानी ऐसा खतरनाक जहर, जो इंसान के अंदर जाते ही उसका दम बाहर कर देता है। शातिर मल्लिका जानती थी कि शिकार के जिंदा रहते लूटपाट मुमकिन नहीं, फिर वो गुनाह के बाद कोई सबूत नहीं छोड़ना चाहती थी। इसीलिए पहले वो हत्या करती थी और फिर लूटपाट करके गायब हो जाती थी।
करीब आठ साल पहले 1999 में उसने ममता नाम की एक महिला को अपना पहला शिकार बनाया। मल्लिका ने उसकी हत्या कर दी और उसके गहने बेचकर कुछ लोगों का कर्ज चुका दिया। कत्ल के महीनों बाद भी वो पकड़ी नहीं गई, तो उसका हौंसला बढ़ गया। दो साल बाद उसने पूजा-पाठ के बहाने एक परिवार को अपना निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन इस बार वो पकड़ी गई। मल्लिका को छह महीने की सजा हुई। जेल से छूटने के बाद कुछ दिन उसने घरों में नौकरानी का काम किया। लेकिन पैसों की किल्लत होते ही उसने फिर एक महिला की हत्या कर दी। मल्लिका ने एक के बाद एक करके चार कत्ल किए। लेकिन इस बार एक मोबाइल फोन ने उसे पुलिस के जाल में फंसा दिया। दरअसल एक महिला की हत्या के बाद वो उसका मोबाइल फोन भी अपने साथ ले गई और उसे बेचने के चक्कर में पुलिस की गिरफ्त में आ गई। फिलहाल मल्लिका ने छह औरतों को सायनाइड देकर मारने की बात कबूली है। लेकिन पुलिस को शक है कि यह फेहरिस्त और लंबी हो सकती है।
बुधवार, 30 जनवरी 2008
मासूमों के जहन में पनपती साजिशें...
कहते हैं बच्चे मन के सच्चे होते हैं. लेकिन वक्त के साथ इस बात के मायने बदल रहे हैं। वक्त के साथ बदल रही है बच्चों की सोच, बदल रहा है बच्चों का नजरिया और बदल रहा है बच्चों का मिजाज। मासूमों के हाथों आए दिन होने वाली वारदात तो कम से कम यही इशारा करती है। कुछ महीने पहले गुड़गांव के एक स्कूल में आठवीं में पढ़ने वाले दो बच्चों ने अपने सहपाठी को गोली मार दी। 12-13 साल के उन लड़कों के बीच झगड़ा किसी मामूली बात पर शुरू हुआ था, लेकिन उसका अंजाम इतना भयानक हुआ कि किसी ने सोचा भी नहीं था। एक लड़के ने दूसरे को सबक सिखाने के लिए बाकायदा एक साजिश रची। उसने अपने पिता की अलमारी से पिस्तौल निकालकर बस्ते में रख ली और स्कूल पहुंचकर उसे बाथरूम में छुपा दिया। स्कूल की छुट्टी हुई तो उस लड़के ने बेखौफ अंदाज में अपने सहपाठी के सीने में कई गोलियां उतार दीं।
ऐसी ही एक साजिश रची थी अहमदाबाद के बंटी ने। 17 साल के बंटी ने पांच लाख की फिरौती के लिए अपने दोस्त लोकेश डडवानी को पहले अगवा किया और फिर अपना गुनाह छुपाने के लिए गला दबा कर उसकी हत्या कर दी। अब ताजा मामला, राजधानी दिल्ली का है। यहां सातवीं में पढ़ने वाले एक बच्चे सचिन (बदला हुआ नाम) ने अपने दोस्त धर्मेंद्र का अपहरण कर लिया। वो भी सिर्फ कुछ रुपयों के लिए। रुपये नहीं मिले, तो उसने अपने दोस्त की हत्या कर दी।
मासूम धर्मेंद्र अपने ही दोस्त की साजिश का शिकार बना और जान से हाथ धो बैठा। इस हादसे ने उसके घरवालों को अंदर तक हिला कर रख दिया है। बेटे की मौत ने उसकी मां को तो इस कदर बदहवास बना दिया है कि जो भी उसे दिलासा देने आता है, उससे वो सिर्फ एक ही सवाल पूछती हैं, मेरे धर्मेंद्र ने भला किसी का क्या बिगाड़ा था... क्यों उसे इतनी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। दरअसल मासूम धर्मेंद्र अपने मां-बाप की उम्मीदों का आखिरी सहारा था। चार साल पहले उनके बड़े बेटे ने खुदकुशी कर ली थी। बडे़ बेटे की मौत के जख्म अब तक हरे थे। ऐसे में धर्मेंद्र की मौत किसी सदमे के कम नहीं है। ऐसा सदमा, जिससे वो लोग शायद ही कभी उबर पाएं। लेकिन धर्मेंद्र के मां-बाप को जितना गम बेटे की मौत का है, उतना ही सदमा इस बात का भी है कि इनके बेटे की हत्या की साजिश उसके ही दोस्त ने रची। वो दोस्त, जिसकी उम्र महज 12 साल है। वो दोस्त, जो धर्मेंद्र के साथ पढ़ता था, साथ-साथ स्कूल जाता था और साथ-साथ खेलता था... वो दोस्त, जिसे धर्मेंद्र के मां-बाप ने भी हमेशा अपने बेटे जैसा समझा था। लेकिन क्या मालूम था कि 12 साल के सचिन की साजिश उनके घर का चिराग बुझा देगी। धर्मेंद्र की हत्या का आरोपी सचिन इस वक्त सलाखों के पीछे है, लेकिन इस खतरनाक साजिश का मास्टरमाइंड रिंकू अभी तक पुलिस गिरफ्त से बाहर है।
मासूम धर्मेंद्र के कत्ल की इस वारदात ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। इलाके के लोग ये जानकर सकते में हैं कि धर्मेंद्र के कत्ल की साजिश के सूत्रधार महज 12 से 14 साल के बच्चे हैं। साजिश भी ऐसी, कि जिसके प्लॉट या तो फिल्मों में मिलते हैं या फिर किसी जासूसी उपन्यासों में। लोग ये सोच कर हैरान हैं कि स्कूली बच्चों के जेहन में अपने ही दोस्त के अपहरण और हत्या की इतनी खतरनाक साजिश आखिर पनपी कैसे...वो भी उस उम्र में, जब ज्यादातर बच्चे अपहरण और फिरौती का मतलब तक ठीक से नहीं समझ पाते।
...तो क्या आज के बच्चे वक्त से पहले बड़े हो रहे हैं... क्या खेलने-कूदने की उम्र में वो गुनाह के खिलाड़ी बन रहे हैं... क्या उनके जहन में अब बचपने की शरारतों के स्थान पर साजिशें पनप रही हैं... जब-भी कोई मासूम गुनहगार बनता है, तो ये सवाल उठने लाजिमी हैं। आज के बच्चे कल के समाज का आइना हैं। और ये आइना जो तस्वीर दिखा रहा है, वो यकीकन बेहद खतरनाक है। आए दिन हो रहे वाकयात इशारा कर रहे हैं कि अगर आज हमने बुनियाद पर ध्यान नहीं दिया, तो कल गिरती हुई दीवार को देखने के सिवाय हमारे पास कोई चारा नहीं बचेगा।
ऐसी ही एक साजिश रची थी अहमदाबाद के बंटी ने। 17 साल के बंटी ने पांच लाख की फिरौती के लिए अपने दोस्त लोकेश डडवानी को पहले अगवा किया और फिर अपना गुनाह छुपाने के लिए गला दबा कर उसकी हत्या कर दी। अब ताजा मामला, राजधानी दिल्ली का है। यहां सातवीं में पढ़ने वाले एक बच्चे सचिन (बदला हुआ नाम) ने अपने दोस्त धर्मेंद्र का अपहरण कर लिया। वो भी सिर्फ कुछ रुपयों के लिए। रुपये नहीं मिले, तो उसने अपने दोस्त की हत्या कर दी।
मासूम धर्मेंद्र अपने ही दोस्त की साजिश का शिकार बना और जान से हाथ धो बैठा। इस हादसे ने उसके घरवालों को अंदर तक हिला कर रख दिया है। बेटे की मौत ने उसकी मां को तो इस कदर बदहवास बना दिया है कि जो भी उसे दिलासा देने आता है, उससे वो सिर्फ एक ही सवाल पूछती हैं, मेरे धर्मेंद्र ने भला किसी का क्या बिगाड़ा था... क्यों उसे इतनी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। दरअसल मासूम धर्मेंद्र अपने मां-बाप की उम्मीदों का आखिरी सहारा था। चार साल पहले उनके बड़े बेटे ने खुदकुशी कर ली थी। बडे़ बेटे की मौत के जख्म अब तक हरे थे। ऐसे में धर्मेंद्र की मौत किसी सदमे के कम नहीं है। ऐसा सदमा, जिससे वो लोग शायद ही कभी उबर पाएं। लेकिन धर्मेंद्र के मां-बाप को जितना गम बेटे की मौत का है, उतना ही सदमा इस बात का भी है कि इनके बेटे की हत्या की साजिश उसके ही दोस्त ने रची। वो दोस्त, जिसकी उम्र महज 12 साल है। वो दोस्त, जो धर्मेंद्र के साथ पढ़ता था, साथ-साथ स्कूल जाता था और साथ-साथ खेलता था... वो दोस्त, जिसे धर्मेंद्र के मां-बाप ने भी हमेशा अपने बेटे जैसा समझा था। लेकिन क्या मालूम था कि 12 साल के सचिन की साजिश उनके घर का चिराग बुझा देगी। धर्मेंद्र की हत्या का आरोपी सचिन इस वक्त सलाखों के पीछे है, लेकिन इस खतरनाक साजिश का मास्टरमाइंड रिंकू अभी तक पुलिस गिरफ्त से बाहर है।
मासूम धर्मेंद्र के कत्ल की इस वारदात ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। इलाके के लोग ये जानकर सकते में हैं कि धर्मेंद्र के कत्ल की साजिश के सूत्रधार महज 12 से 14 साल के बच्चे हैं। साजिश भी ऐसी, कि जिसके प्लॉट या तो फिल्मों में मिलते हैं या फिर किसी जासूसी उपन्यासों में। लोग ये सोच कर हैरान हैं कि स्कूली बच्चों के जेहन में अपने ही दोस्त के अपहरण और हत्या की इतनी खतरनाक साजिश आखिर पनपी कैसे...वो भी उस उम्र में, जब ज्यादातर बच्चे अपहरण और फिरौती का मतलब तक ठीक से नहीं समझ पाते।
...तो क्या आज के बच्चे वक्त से पहले बड़े हो रहे हैं... क्या खेलने-कूदने की उम्र में वो गुनाह के खिलाड़ी बन रहे हैं... क्या उनके जहन में अब बचपने की शरारतों के स्थान पर साजिशें पनप रही हैं... जब-भी कोई मासूम गुनहगार बनता है, तो ये सवाल उठने लाजिमी हैं। आज के बच्चे कल के समाज का आइना हैं। और ये आइना जो तस्वीर दिखा रहा है, वो यकीकन बेहद खतरनाक है। आए दिन हो रहे वाकयात इशारा कर रहे हैं कि अगर आज हमने बुनियाद पर ध्यान नहीं दिया, तो कल गिरती हुई दीवार को देखने के सिवाय हमारे पास कोई चारा नहीं बचेगा।
बुधवार, 15 अगस्त 2007
स्वाधीनता दिवस पर संकल्प
अस्तित्व में बाधक हर कठिनाई जीत चुके हैं
सभ्यता की नई ऊंचाई जीत चुके हैं
किन्तु संयम का सबक सीखना बाकी है
मानव जीवन का मूल्य समझना बाकी है
दिल की दीवारों को चलो मिलकर तोड़ें
मानव रक्त से मानचित्रों को रंगना छोड़ें
आओ, एक कुटुम्ब की भांति रहने का अभ्यास करें
शांति के संकल्प सहित आगे बढ़ने का प्रयास करें...
सभ्यता की नई ऊंचाई जीत चुके हैं
किन्तु संयम का सबक सीखना बाकी है
मानव जीवन का मूल्य समझना बाकी है
दिल की दीवारों को चलो मिलकर तोड़ें
मानव रक्त से मानचित्रों को रंगना छोड़ें
आओ, एक कुटुम्ब की भांति रहने का अभ्यास करें
शांति के संकल्प सहित आगे बढ़ने का प्रयास करें...
शुक्रवार, 10 अगस्त 2007
अभाव (1998)
आज भी, दिन पहले की तरह पूरब से चलता है
थक-हार कर सूरज पश्चिम में ही ढलता है
पल-पल मेरा व्यस्तता के साये में पलता है
पर, दिल में कहीं गहरे, एक अभाव सा खलता है।।
आज भी, हर परिचित चेहरा हंस के मिलता है
अनजान शख्स उसी तरह बच के निकलता है
शिकवों की ज्वाला में जीवन क़तरा-क़तरा जलता है
पर, दिल में कहीं गहरे, एक अभाव सा खलता है।।
आज भी, वक्त रेत की भांति हाथों से फिसलता है
कुछ खोने के अहसास से ह्रदय दिन-रात सिसकता है
यूं तो साथ यादों का एक काफ़िला भी चलता है
पर, दिल में कहीं गहरे, एक अभाव सा खलता है।।
कहने को तो पूर्ववत्, सब सामान्य लगता है
पर, हल्का होने को मन अक्सर, किसी कंधे के लिये तरसता है
पश्चाताप की अग्नि में, अस्तित्व मेरा गलता है-
यकीन मानो, दिल में कहीं गहरे एक अभाव सा खलता है...
सचमुच नितांत व्यक्तिगत अभाव.......
11-04-98
थक-हार कर सूरज पश्चिम में ही ढलता है
पल-पल मेरा व्यस्तता के साये में पलता है
पर, दिल में कहीं गहरे, एक अभाव सा खलता है।।
आज भी, हर परिचित चेहरा हंस के मिलता है
अनजान शख्स उसी तरह बच के निकलता है
शिकवों की ज्वाला में जीवन क़तरा-क़तरा जलता है
पर, दिल में कहीं गहरे, एक अभाव सा खलता है।।
आज भी, वक्त रेत की भांति हाथों से फिसलता है
कुछ खोने के अहसास से ह्रदय दिन-रात सिसकता है
यूं तो साथ यादों का एक काफ़िला भी चलता है
पर, दिल में कहीं गहरे, एक अभाव सा खलता है।।
कहने को तो पूर्ववत्, सब सामान्य लगता है
पर, हल्का होने को मन अक्सर, किसी कंधे के लिये तरसता है
पश्चाताप की अग्नि में, अस्तित्व मेरा गलता है-
यकीन मानो, दिल में कहीं गहरे एक अभाव सा खलता है...
सचमुच नितांत व्यक्तिगत अभाव.......
11-04-98
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